Friday, May 31, 2019


नादान उड़ान

दूर पेड़ की खोखल में, बैठा हुआ है एक नादान
सब गये है दाना लेने, मेरे आगे खाली बितान
हुआ साहसी सहसा परिंदा, मन से उसने ठान लिया
आँखों में ले सुनहरा ख्वाव, आकाश को अपना मान लिया
खोखर  किनारे लगा सोचने, उड़ने की हिम्मत आई है
गिरते हुए संभला है जो, उसने ही तो  मंजिल पायी है
कोई नही घर पर आज,  मै भी उडकर  देखूंगा
हंसने वाला कोई नही है,  मै भी गिरकर देखूंगा
गिराया खुद को उपर से , एकाएक भय मन के घूल गये
संभाल लिया  उर आकाश में , पंख एकदम खुल गये
इस परवाज़ से उसने , सूने अम्बर को जीत लिया
देर से ही डरकर ही , उसने भी उड़ना सीख लिया

कृष्ण कौशिक

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