Friday, May 31, 2019

दीपावली की सुदिनमणि वलय सी संध्या पर आप सब को बहुत बहुत बधाई।

इस पावन अवसर पर आज घर से दूर बैठे श्रान्त हृदय से कुछ पंक्तियाँ निकली
मेरी नई कविता दीवाली की रात

अरुण वेला सी रंगी शगुन तुम किसके अनुराग
स्वर्ग धरा सी किरण उड़ती हो बन  परमाणु पराग

वीणा स्वर सी गुंजा फिर क्यूं है आज मौन
सकल संसार की वेदना पीर सी तुम हो कौन।

उमंग सरिता से शून्य हृदय है अर्णव अलके अनंत
शबनम सी गिरी उषा आँचल में लो फिर आयी बसन्त

सविलास शिशु मस्ती से उलझे घुंघराले कांत
विचरण करती कौन तुम चांदनी में आश्रान्त

हृदय की अविरल अग्नि कर रही अब अश्रुघात
स्नेह-दीया उज्वलित कर बना ली दीवाली की रात

कृष्ण कौशिक

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